हिन्दी साहित्य को अमर उपन्यास देने वाले फणीश्वर नाथ रेणू के बहुचर्चित आंचलिक उपन्यास "मैला आँचल " में फाग गीत अथवा ऋतुगीत के नाम से गाये जाने वाले लोक गीतों का बड़ा ही मार्मिक व् सटीक उपयोग हुआ है, जिसमें से एक है कान्हा के रंगीले मोहक मिजाज का मोहमय वर्णन , जो इस प्रकार है -"अरे बहियाँ पकडि झकझोरे श्याम रे
फूटल रेसम जोड़ी चूडी
मसुकी गयी चोली भिंगावल साडी
आँचल उडि जाए हो
ऐसी होरी मचायो श्याम रे ....!"
मैला आँचल में एक पात्र है फुलिया जिसने रमजू की स्त्री के आँगन में खलासी जी से भेंट करके कहा था कि "इस साल होली नैहर में ही मनाने दो " मन की मस्ती भरी इस इच्छा को गीत के रूप में इस प्रकार उडेला गया है -
नयना मिलानी करी ले
अब की बेर हम नैहर रहिबो
जो दिल चाहे सो करी ले ......!"

आईये एक ऐसे कवि की चर्चा करते हैं जिन्होंने हिन्दी साहित्य को गीत विधा का नया रूप ही नही दिया अपितु गीत के माध्यम से हिन्दी साहित्य को नया आयाम भी दिया , नाम है गोपाल सिंह नेपाली जिन्होंने होली पर अपनी अभिव्यक्ति कुछ इस प्रकार दी है -
रंगों का त्यौहार अनूठा
चुनरी इधर, उधर पिचकारी,
गाल-भाल पर कुमकुम फूटा
लाल-लाल बन जाते काले ,
गोरी सूरत पीली-नीली ,
मेरा देश बड़ा गर्वीला,
रीति-रसम-ऋतु रंग-रगीली ,
नीले नभ पर बादल काले ,
हरियाली में सरसों पीली !"

यह गीत उन्होंने वर्ष १९५७ में लिखी , जो आज भी प्रासंगिक है । कविवर सूर्यकांत त्रिपाठी निराला ने फागुन का वर्णन कुछ इस प्रकार किया है -
"सखि, बसंत आया ।
भरा हर्ष बन के मन ,नवोत्कर्ष छाया ।
किसलय-वसना नव-वय लतिका
मिली मधुर प्रिय -उर तरु पतिका ,
मधुप -वृन्द वंदी पिक-स्वर नभ सरसाया ।
सखि,बसंत आया । "

वहीं डा० हरिवंश राय बच्चन की नज़रों में होली ऐसी है-
जगती होली की ज्वाला ,
एक बार ही लगती बाजी,
जलती दीपो की माला,
दुनिया वालों ,किंतु किसी दिन
आ मदिरालय में देखो ,
दिन को होली , रात दिवाली ,
रोज मनाती मधुशाला !"

प्रखर गीतकार गोपाल दास नीरज की नज़रों में बसंत कुछ ऐसा है-
"आज वसंत की रात ,
गमन की बात न करना ।
धूल बिछाए फूल-खिलौना,
बगिया पहने चांदी-सोना,
कलियाँ फेंके जादू-टोना,
महक उठे सब पात,
हवन की बात न करना । "
धूल बिछाए फूल-खिलौना,
बगिया पहने चांदी-सोना,
कलियाँ फेंके जादू-टोना,
महक उठे सब पात,
हवन की बात न करना । "


और अब बसंत की बात छेड़ने पर क्या कहते हैं कुंवर वेचैन ?
ओ वासंती पवन हमारे घर आना!
जड़े हुए थे ताले सारे कमरों में
धूल भरे थे आले सारे कमरों में
उलझन और तनावों के रेशों वाले
पुरे हुए थे जले सारे कमरों में
बहुत दिनों के बाद साँकलें डोली हैं
ओ वासंती पवन हमारे घर आना!
और राम विलास शर्मा की नज़रों में देखिये वसंत के शब्द चित्र :और/ खिल उठते हैं
अनुराग रंजित सुर्ख फूल
देखते-देखतेवसंत
महज चितवन से
एक ही झटके में उखाड़ देता है
बाघिन सी खूंखार सर्दी के
नुकीले, तीखे नख दन्त
बड़ा बाजीगर है वसंत !
महज चितवन से
एक ही झटके में उखाड़ देता है
बाघिन सी खूंखार सर्दी के
नुकीले, तीखे नख दन्त
बड़ा बाजीगर है वसंत !
इस सन्दर्भ में राष्ट्रकवि दिनकर का अंदाज़ कुछ अलग हटाकर है :लौट जाता गंधवह सौरभ बिना फिर-फिर मलय को,
पुष्पषर चिंतित खडा संसार के उर की विजय की ,
मौन खग विस्मित- " कंहा अटकी मधुर उल्लास वाली !
मैं शिशिर - शीर्णा चली , अब जाग ओ मधुमासवाली !!
मुक्त करने को विकल है लाज की मधु-प्रीति कारा,
विश्व - यौवन की शिरा में नाचने को रक्तधारा,
चाहती छाना दृग में आज तजकर गाल लाली !
मैं शिशिर - शीर्णा चली , अब जाग ओ मधुमासवाली !!
!!मस्ती !!() () आनन्द विल्थरे
वसंत के
विस्तरे पर लेटा फागुन
मेरे भी दिल में
आग भड़का रहा है
काश, हम उसे
समझा पाते
कि गीली बारूद के पीछे
मिहनत करने से कोई
लाभ नहीं है,
लेकिन वह तो
अपनी ही धुन में
भर-भर कटोरे
मस्ती छलका रहा है !
()()()
गजानन सिंह 'नम्र' बसंत का स्वागत करते हुए कुछ इसतरह बयान करते हैं :आम्र के श्रृंगार में, नीर के आगार में,
तारों की बरात में, उजाला वसंत है !
उषा की ललाई में, रवि अरुणाई में ,
शशि अंगराई में, निखारा वसंत है !
जीवन संगीत में, मानव की प्रीत में
भ्रमरों के गीत में, बिखरा वसंत है!
नवल आकाश में, कोमल सी घास में,
मन के विशवास में, लहरा वसंत है !
और आनंद शर्मा कहते हैं कि :फागुन इतने रंग न घोल!
जमीन बर्फ कुछ तो पिघला दे
माथा ठंडा है, सहला दे,
होते दीवारों के कान-
फागुन हौले-हौले बोल!
पीली पडी धरा की देह
फागुन इतने रंग न घोल!
जमीन बर्फ कुछ तो पिघला दे
माथा ठंडा है, सहला दे,
होते दीवारों के कान-
फागुन हौले-हौले बोल!
पीली पडी धरा की देह
फागुन इतने रंग न घोल!


2 comments:
अच्छे है आपके विचार, ओरो के ब्लॉग को follow करके या कमेन्ट देकर उनका होसला बढाए ....
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