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२) पिता का नाम - श्री प्रेम नारायण पाण्डेय, माता का नाम- श्रीमती गीता पाण्डेय , जन्मस्थान- सकलडीहा, चन्दौली
३)वर्तमान पता : सकलडीहा बाजार, चन्दौली (उ०प्र०) २३२१०९
ई मेल का पता : hkptunna@gmail.com
टेलीफोन/मोबाईल न. 9208482892
४)आपके प्रमुख व्यक्तिगत ब्लॉग : सच्चा शरणम (http://ramyantar.blogspot.com), अखिलं मधुरम (http://akhilam-madhuram.blogspot.com)
५)अपने ब्लॉग के अतिरिक्त अन्य ब्लॉग पर गतिविधियों का विवरण : साइंस ब्लॉगर्स असोसिएशन, नुक्कड़, चर्चा हिन्दी चिटठों पर समयानुसार लेखन ।
६)अपने ब्लॉग के अतिरिक्त आपको कौन कौन सा ब्लॉग पसंद है ? बहुत से ! सूचीबद्ध करना कठिन है । श्रमसाध्य भी । फिर भी मानसिक हलचल (ज्ञानदत्त पाण्डेय), शब्दों का सफर (अजित वडनेरकर), साई ब्लॉग (अरविन्द मिश्र), फुरसतिया (अनूप शुक्ल), प्राची के पार (दर्पण शाह दर्शन), अवधी के अरघान (अमरेन्द्र त्रिपाठी), एक आलसी का चिट्ठा (गिरिजेश राव), आर्जव (अभिषेक कुशवाहा), पद्मालय (पद्म सिंह), आराधना चतुर्वेदी का ब्लॉग (मुक्ति), आदि नियमित पढ़ता हूँ ।
७)ब्लॉग पर कौन सा विषय आपको ज्यादा आकर्षित करता है? गम्भीर, अर्थपूर्ण, सरोकार युक्त प्रविष्टियाँ ज्यादा आकर्षित करती हैं । उन प्रविष्टियों का आग्रह अधिक है, जिनमें सजग रचनाशीलता के बहुविध आयाम सिमटे हों ।
८)आपने ब्लॉग कब लिखना शुरू किया ? 24 सितम्बर २००८ को पहली प्रविष्टि ।
९)यह खिताब पाकर आपको कैसा महसूस हो रहा है ? उत्साहित हूँ..इसलिये कि शायद यह इंगिति हो बेहतर टिप्पणीकार बनने के लिए ! अंगुलि निर्देश-सा है यह मेरे लिये ! मन कुछ दूसरा ही समझ-बूझ रहा है । अन्यथा मुझमें यह योग्यता नहीं ही है शायद !
१०)क्या ब्लोगिंग से आपके अन्य आवश्यक कार्यों में अवरोध उत्पन्न नहीं होता ?ब्लॉगिंग शुरु की थी..तब से यह भी आवश्यक कार्यो की सूची में शामिल है ! मेरी विरम-सी गयी रचनाशीलता को अभिव्यक्ति दी इस ब्लॉगिंग ने । तो अवरोध कैसा ? बहुत-सी चीजें खुलीं ।बहुत से अवरोध हटे, टूटे ।
११)ब्लोगोत्सव जैसे सार्वजनिक उत्सव में शामिल होकर आपको कैसा लगा ? महसूस किया मैंने कि उस बड़ी परिघटना का अंग बन रहा हूँ, जिससे ब्लॉगिंग की दशा-दिशा तय होनी है । सब कुछ मुखर हो गया था उत्सव के बहाने...उत्सव की लीक ने अनेकों राहें खोल दी हैं । एक साथ, एक स्वर...सब उत्सव की प्रेरणा और प्राण-चेतना के अंग बन रहे थे ! अद्भुत था यह...खूबसूरत अनुभव ।
१२)आपकी नज़रों में ब्लोगोत्सव की क्या विशेषताएं रही ? यह ब्लॉगोत्सव अनोखी परिकल्पना का प्रसाद था, बहुरंगी, भविष्योन्मुख रचनाशीलता की मुखर अभिव्यक्ति था, नयी प्रतिभाओं का सुन्दर मिलन स्थल था । साहित्य और अभिव्यक्ति की समस्त संभावनाएं जैसे सिमट गयी थीं यहाँ, इकट्ठी हो गयी थीं ।
१३)ब्लोगोत्सव में वह कौन सी कमी थी जो आपको हमेशा खटकती रही ? कमी नहीं..अपनी असुविधा कह सकता हूँ । टिप्पणियाँ करने के लिये उत्सव-ब्लॉग पर जाना, फिर मुख्य ब्लॉग पर लौटना...पुनः उत्सव ब्लॉग की ओर मुड़ना परेशानी भरा था !
एक कमी ब्लॉगोत्सव प्रविष्टियों पर कम टिप्पणियों का आना महसूस हुई ! सबने खुलकर टिप्पणियाँ नहीं कीं । शायद संभव भी नहीं था मुक्त-कंठ प्रत्येक प्रविष्टि पर टिप्पणी कर पाना ।
१४)ब्लोगोत्सव में शामिल किन रचनाकारों ने आपको ज्यादा आकर्षित किया ? एक नाम नहीं लूँगा । अनेकों ऐसे रचनाकार थे..जिन्हें निरन्तर पढ़ता रहा हूँ, पढ़ता रहता हूँ ! बहुत-सी विभूतियों के साक्षात्कार मन को भाए ! रश्मि प्रभा जी का तो शायद यह उत्सव शायद यह उत्सव सदैव आभारी रहेगा ।
१५)किन रचनाकारों की रचनाएँ आपको पसंद नहीं आई ? कोई टिप्पणी नहीं ।
१६)क्या इस प्रकार का आयोजन प्रतिवर्ष आयोजित किया जाना चाहिए ? निःसन्देह किया जाना चाहिए इस तरह का आयोजन ! अनेकों नये लोगों को जुड़ना चाहिए इससे ! नयी संभावनाएं जन्म लेंगी, नये आयाम खुलेंगे ।
१७)आपको क्या ऐसा महसूस होता है कि हिंदी ब्लोगिंग में खेमेवाजी बढ़ रही है ? रचनाकर्म में खेमेबाजी का अस्तित्व नहीं ! जिन्हें रचना है वह रच रहे हैं...खेमे के लिए नहीं रच रहे...एक विशाल वर्ग के लिए रच रहे हैं । या ठीक उलट स्वयं के तोष के लिए रच रहे हैं । जो रचते नहीं...रचना जानते नहीं...रचना कर्म का औदात्य समझते नहीं...वो खेमेबाज हैं, खेमे बना रहे हैं । जहाँ रचनाकर्म बाजार की वस्तु है..वहाँ खेमेबाजी है । वस्तुतः मुझे खेमा नहीं दिखता कोई ।
१८)क्या यह हिंदी चिट्ठाकारी के लिए अमंगलकारी नहीं है ? यदि हाँ, तो अमंगलकारी है !
१९)आप कुछ अपने व्यक्तिगत जीवन के बारे में बताएं : कस्बाई जिन्दगी में निखरता-बिखरता सहज-सा जीवन ! ’जो मिल गया उसी को मुकद्दर समझ लिया, जो खो गया मैं उसको भुलाता चला गय” की लीक लिये ’वसुधा से भिन्न कहीं होता है नन्दन वन ?, ऐसी प्रतीति जिय में मैं ठानता नहीं, उसे जानता नहीं, उसे मानता नहीं’ का श्लोक पढ़ता हुआ हिमांशु हूँ मैं । पूरे परिवार का सान्निध्य है । सुहृद पत्नी,सुघर बेटी ने भर दिया है मुझे । शेष क्या, अपने कस्बे के महाविद्यालय में हिन्दी पढ़ाता हूँ । खुश रहता हूँ, रहने की कोशिश करता हूँ ।
२०)चिट्ठाकारी से संवंधित क्या कोई ऐसा संस्मरण है जिसे आप इस अवसर पर सार्वजनिक करना चाहते हैं ? स्मरण नहीं ।
२१) अपनी कोई पसंदीदा रचना की कुछ पंक्तियाँ सुनाएँ
बहुत पसन्द करता हूँ यह कविता -
जो प्रश्न हैं अस्तित्वगत
तूं खींच चिन्तन बीच मत
बस जी उसे उस बीच चल
उससे स्वयं को दे बदल ।
यदि प्रेम को है जानना
तो खाक उसकी छानना
उसे प्रेम के भीतर उतर
निज पूर्ण कायाकल्प कर ।
जो प्रश्न के आयाम हैं
सब बुद्धि के व्यायाम हैं
संतुष्ट हो या हो नहीं
अंतर न कुछ पड़ता कहीं ।
पहले जहां थे हो वहीं
हो ही नहीं पाये सही
कुछ भी न परिवर्तित हुआ
क्या प्रश्न ने अन्तर छुआ?
कुछ तर्क दे सकता नहीं
वह नाव खे सकता नहीं
विधि हो न तो सब व्यर्थ है
बस आंख का ही अर्थ है ।
दे संशयात्मा मन बदल
संशय न कर चल शीघ्र चल
हो दृष्टि की उपलब्धता
बस है इसी में सत्यता ।
| बहुत बहुत धन्यवाद हिमांशु जी .....इस अवसर पर ऋग्वेद की दो पंक्तियां आपको समर्पित है कि - ‘‘आयने ते परायणे दुर्वा रोहन्तु पुष्पिणी:। हृदाश्च पुण्डरीकाणि समुद्रस्य गृहा इमें ।।’’अर्थात आपके मार्ग प्रशस्त हों, उस पर पुष्प हों, नये कोमल दूब हों, आपके उद्यम, आपके प्रयास सफल हों, सुखदायी हों और आपके जीवन सरोवर में मन को प्रफुल्लित करने वाले कमल खिले। |
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प्रस्तुति: रवीन्द्र प्रभात



17 comments:
और मैं अपने साथ सबको महसूस करती हूँ, शुक्रिया हिमांशु जी ...
कुछ तर्क दे सकता नहीं
वह नाव खे सकता नहीं
विधि हो न तो सब व्यर्थ है
बस आंख का ही अर्थ है ।
बधाई
हिमांशु जी को बहुत बहुत बधाई....
बहुत बहुत बधाई....
हिमांशु जी को बहुत - बहुत बधाई.
हिमांशु जी को बहुत - बहुत बधाई.
हिमांशु जी को सम्मान के लिए बहुत बहुत बधाई...
रवींद्र जी और ब्लॉगोत्सव टीम २०१० का आभार...
जय हिंद..
इस सम्मान के लिये हिमांशु जी को हार्दिक बधाई और भविष्य के लिये बहुत शुभ्काम्नायें!
हिमांशु जी मेरे प्रिय ब्लॉगर हैं और यह उनके प्रति मेरा स्नेह उनकी बौद्धिकता को लेकर है -बधाई पर्रिकल्पना को इस ब्लॉगर को फोरम पर धर पकड़ पाने में सफलता के लिए -वैसे हैं कहना महानुभाव इन दिनों ?
लगता है क्वचिदअन्यतोअपि की रेटिंग गिर रही है ..मगर साईब्लाग हिमांशु जी की पसंद है तो उसी पर थोडा और महानता करता हूँ ! और वे क्या साईंस ब्लागर्स को भूल गए क्या ?
हिमांशु जी मेरे प्रिय ब्लॉगर हैं और यह उनके प्रति मेरा स्नेह उनकी बौद्धिकता को लेकर है -बधाई पर्रिकल्पना को इस ब्लॉगर को फोरम पर धर पकड़ पाने में सफलता के लिए -वैसे हैं कहना महानुभाव इन दिनों ?
लगता है क्वचिदअन्यतोअपि की रेटिंग गिर रही है ..मगर साईब्लाग हिमांशु जी की पसंद है तो उसी पर थोडा और महानता करता हूँ ! और वे क्या साईंस ब्लागर्स को भूल गए क्या ?
बहुत बहुत बधाई एवं हार्दिक शुभकामनाएँ.
बहुत ही गहरी सोच के मालिक, कविता से ही पता चल जाता है। बहुत बहुत बधाई!! प्रत्येक व्यक्ति जीवन भर सीखते चला जाता है। हमारे लिये एक और पाठ!
हिमांशु को बहुत बधाई व शुभकामनायें ..!
दे संशयात्मा मन बदल
संशय न कर चल शीघ्र चल
हो दृष्टि की उपलब्धता
बस है इसी में सत्यता ।
बहुत बधाई आपको हिमांशु जी ।
नुक्कड़ गया था , वहाँ से हिमांशु भाई को देखा और यहाँ चला आया .. जाकिर अली द्वारा बांटे गए इनामों को देखकर ,सलीम खान के परिप्रेक्ष्य में , ब्लॉग जगत की इनाम-बाजी से विश्वास उठा है ! .. पर किसी अच्छे आदमी को इनाम मिलता है तो खुशी होती है ! .. यह खुशी मुझे यहाँ हुई है .. ! कुछ कद होते हैं जिनसे इनाम गौरवान्वित होता है , हिमांशु ऐसे ही कद है ! ... आभार !
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