यह केवल उत्सव नही पारस्परिक प्रेम का प्रस्तुतिकरण है... आइए हिन्दी को नया आयाम दिलाएँ... हम सब मिलकर ब्लॉग उत्सव मनाएँ...

पढ़िए और सुनिए श्री राजेन्द्र स्वर्णकार के द्वारा रचित और स्वरबद्ध रचना :मन है बहुत उदास रे जोगी !

सोमवार, 24 मई 2010

संक्षिप्त परिचय

नाम : राजेन्द्र स्वर्णकार
जन्म : 21 सितंबर
पिता का नाम : स्वर्गीय श्री शंकरलालजी
माता का नाम : श्रीमती भंवरीदेवी
स्थायी पता : गिराणी सोनारों का मौहल्ला ,
बीकानेर 334001 ( राजस्थान )
ईमेल : swarnkarrajendra@gmail.com
ईमेल : shabdswarrang@gmail.com
ब्लॉग : http://shabdswarrang.blogspot.com/

===============================================================
पढ़िए  और  सुनिए श्री राजेन्द्र स्वर्णकार के द्वारा रचित और स्वरबद्ध  रचना  :मन है बहुत उदास रे जोगी !

मन है बहुत उदास रे जोगी !
*********************

मन है बहुत उदास रे जोगी !
आज नहीं प्रिय पास रे जोगी !

पूछ न ! प्रीत का दीप जला कर
कौन चला बनवास रे जोगी !

जी घुटता है ; बाहर चलती
लाख पवन उनचास रे जोगी !

अब सम्हाले' संभल न पाती
श्वास सहित उच्छ्वास रे जोगी !

पी' मन में रम - रच गया ; जैसे
पुष्प में रंग - सुवास रे जोगी !

प्रेम - अगन में जलने का तो
हमको था अभ्यास रे जोगी !

किंतु विरह - धूनी तपने का
है पहला आभास रे जोगी !

धार लिया तूने तो डर कर
इस जग से सन्यास रे जोगी !

कौन पराया - अपना है रे !
क्या घर और प्रवास रे जोगी !

चोट लगी तो तड़प उठेगा
मत कर तू उपहास रे जोगी !

प्रणय विनोद नहीं रे ! तप है !
और सिद्धि संत्रास रे जोगी !

छोड़ हमें राजेन्द्र अकेला
है इतनी अरदास रे जोगी !

- राजेन्द्र स्वर्णकार
http://shabdswarrang.blogspot.com/




पुन: परिकल्पना पर वापस जाएँ

4 comments:

'उदय' ने कहा…

...सुन्दर रचना !!

अल्पना वर्मा ने कहा…

बहुत ही उम्दा गीत लिखा है .
बेशक राजेंद्र जी का काव्य पाठ सुनने वाले को मन्त्र मुग्ध कर देता है.बेहतरीन प्रस्तुति.

Rajey Sha ने कहा…

बड़ी शरीफ और भली रचना है।

सुनील गज्जाणी ने कहा…

kya bhoob kaha hai , rajenendra jee aap ne , hamara soubhagya hai hai ki hume aap ko bahut baar aamne saamne suna hai , aur har baar aap naya rang liye nazar aate hai . sadhuwad.

Real Time Web Analytics