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मंजू गुप्ता की कविताएँ

सोमवार, 31 मई 2010









वीर भगत सिंह की देश भक्ति
(प्रथम सर्ग)

जल -धरा -हवा -आकाश - आग 
जीवन के ये सारे हैं महातत्व
चलता इनसे चेतना में प्राण
प्रभु !बुद्धि का भर दो भंडार ।

करो कृपा हम पर करतार
दे दो बल - विद्या - ज्ञान अपार
स्पर्श -रूप -रस - गंध -शब्द से
हो जीवन में नव विद्या निर्धार ।

प्रभु ! अर्ज हमारी हो स्वीकार
न हो जीवन में ज्ञान अभाव
करें जग हितकर में सब काम
अहितकर में बुद्धि करे विराम ।

(द्वितीय सर्ग)

जब भारत माता जकड़ी थी
पैरों में बेड़ियाँ पड़ी थीं
जहाँ सूरज अस्त न होता था
ब्रिटिश हुकूमत चलती थी ।

कहर गुलामी का बरसा था
१८५७ का विद्रोह कुचला था
कम्पनी सरकार थी हिल गई
गोरों का शासन चलता था ।

भेद भाव की नीति उनकी
फूट डालो की राजनीति थी
साम्राज्यवाद की चाल चली
भारत की आजादी छीनी ।

ऐसे गहन अंधकार में
भारत की पवित्र भूमि पर
ज्योति किरन थी चमकी
तब मिट्टी धरा की महकी ।

धुंधले भारत के आंगन में
नव खुशियों की हवा बही
तब शहनाई भी बजी थी
आया क्रान्ति दूत अवतारी ।

बंगा के जिले लायलपुर में
२८ सितम्बर १९०७ को
किशन -विद्यावती के गृह में
जन्मा था महावीर भगत सिंह ।

(तृतीय सर्ग)

खुशियाँ पुत्र रतन की छाई
आंगन ने रंगोली सजाई
स्वागत में वंदनवार लगाई
दी आशीर्वादों ने बधाई ।

सबकी आँखों का था तारा
लगता "गुरु नानक"- सा प्यारा
अलौकिक - सी थी बाल लीला
ईश का था पैगाम लाया ।

क्रान्ति का सुनहरा प्रभात था
निडरता का प्रतिरूप था
अपने दु: ख -दर्द को भूला था
देश के दर्द का बवंडर था ।

विलक्षणता का परिचायक था
देश भक्ति का मतवाला था
न्याय धर्म का उपासक था
अन्याय के लिए आग था ।


मंजू गुप्ता
http://manjushrree.blogspot.com/





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5 comments:

Suman ने कहा…

nice

कविता ने कहा…

इस ओजपूर्ण रचना हेतु बधाई।

Shekhar Kumawat ने कहा…

bahut sundar kavita he

shahid ko naman

सुनील गज्जाणी ने कहा…

manju jee ,pranam
lay badh ,chand badh kavya , puri jeevni ek nayak ki samne rakh di aap ne badhai,
sadhuwad

alka sarwat ने कहा…

इन्हीं के जीवन से हमें सीख लेनी है
हर भारतीय में ऐसा भगत सिंह जन्मे

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