यह केवल उत्सव नही पारस्परिक प्रेम का प्रस्तुतिकरण है... आइए हिन्दी को नया आयाम दिलाएँ... हम सब मिलकर ब्लॉग उत्सव मनाएँ...

क्या हम अपना भविष्य देख सकते हैं?

बुधवार, 28 अप्रैल 2010

जन्म : 18 अक्तूबर 1973 / शिक्षा : एम0एस-सी (गणितीय सांख्यकी)/ सृजन: विगत बारह वर्षों से अनवरत लेखन। विज्ञान कथाएं (साइंस फिक्शन) व हास्य लेखन में विशेष रूचि। देश की प्रमुख पत्र पत्रिकाओं विज्ञान प्रगति, विज्ञान कथा, सरिता, आविष्कार, विज्ञान, राष्ट्रीय सहारा, इलेक्ट्रानिकी आपके लिए, नेहा इत्यादि में कहानियाँ प्रकाशित। नाट्य लेखन: प्रमुख मंचित नाटक हैं - उठाये जा सितम, पानी कहाँ हो तुम, बहू की तलाश, चोर-चोर मौसेरे, हाय ये मैली हवा, ये है डाक्टरी वर्कशाप, ये दिल मांगे पॉप, कहानी परलोक की,हाजिर हो, सौ साल बाद, पागल बीवी का महबूब, माडर्न हातिमताई, बुड्ढा फ्यूचर इत्यादि। टेलीफिल्म: ये सच है तथा अनजान रिश्ते लखनऊ दूरदर्शन से प्रसारित। अ¡धेरों की जंग, सितमगर इत्यादि अनेक टेलीफिल्मस का निर्माण। रेडियो प्रसारण : अकेला, जीवित ऊर्जा, असली नकली इत्यादि कहानियां रेडियो से प्रसारित। दिल का मामला, हम भी हैं इंसान, रंगीले बाबा के रंग टीवी सीरियल लखनऊ दूरदर्शन से प्रसारित । किताबें :ताबूत (विज्ञान कथा में धारावाहिक रूप में प्रकाशित) /खुदा का वजूद साइंस की दलीलों में (थियोलोजी)/
प्रोफेसर मंकी (साइंस फिक्शन कहानियों का संग्रह)/कंप्यूटर की मौत (साइंस फिक्शन कहानियों का संग्रह) /एसोसियेशन ऑफ एजूकेशनल इम्प्रूवमेन्ट के अध्‍यक्ष, भारतीय विज्ञान कथा लेखक समिति, भारतीय विज्ञान कांग्रेस व तस्लीम के आजीवन सदस्य। अनेक कार्यशालाओं में स्क्रिप्ट लेखक विशेषज्ञ के तौर पर योगदान।प्रस्तुत है इनका एक सारगर्भित आलेख-


क्या हम अपना भविष्य देख सकते हैं?

बीसवीं सदी की शुरुआत में महान वैज्ञानिक अलबर्ट आइंस्टीन ने एक थ्योरी पेश की जिसका नाम था, ‘सापेक्षता का सिद्धान्त (Theory of relativity)। इस थ्योरी के अनुसार ब्रह्माण्ड में कुछ भी रुका हुआ नहीं है। सभी एक दूसरे के सापेक्ष (Relative) चल रहे हैं। इसका मतलब ये है कि जब हम किसी चीज़ को किसी जगह पर देखते हैं तो वह वास्तव में ‘उस जगह’ पर नहीं होती। मिसाल के तौर पर हम आसमान में एक तारा देखते हैं। वह तारा वास्तव में करोड़ों प्रकाश वर्ष (Light Year) दूर होता है। यानि उस तारे से हमारी आँखों तक रौशनी आने में करोड़ों साल लगे। स्पष्ट है कि हम उस तारे की करोड़ों साल पहले की पोजीशन देख रहे हैं। अब चूंकि हम और वह तारा एक दूसरे के सापेक्ष चल रहे हैं, इसलिए वर्तमान में वह तारा कहीं का कहीं पहुंच चुका होगा। यह भी हो सकता है कि उसका अस्तित्व अब तक खत्म हो चुका हो। इसी तथ्य का इस्तेमाल करते हुए आइंस्टीन ने अपनी थ्योरी में कहा कि ब्रह्माण्ड में किसी चीज की स्थिति चार विमाओं (Dimensions) से बतायी जा सकती है। ये हैं लम्बाई, चौड़ाई, गहराई और समय, दूसरे शब्दों में कहें तो चीज़ें निर्भर हैं स्पेस-टाइम पर। यही नहीं यूनिवर्स में चीज़ों की स्थिति जो हम देखते हैं उसपर दूसरी चीज़ों का गुरुत्व भी असर डालता है। दरअसल रौशनी की किरणें जब किसी बड़ी बॉडी (स्टार या ग्रह) के पास से गुजरती हैं तो उसकी ग्रेविटी की वजह से मुड़ जाती हैं। अर्थात हमारी आँखों तक किसी स्टार से आने वाली रौशनी सीधी न होकर कर्व (Curve) होती है। मतलब ये कि हम जो ‘सीधा’ स्पेस देखते हैं वह कर्व है। या एक सीधे स्पेस को हम कर्व रूप में देखते हैं।


अब एक ऐसे सिस्टम की कल्पना कीजिए जहां मिसाल के तौर पर तीन तारे एक साथ पैदा होते हैं। माना पहला दूसरे से और दूसरा तीसरे से एक लाख प्रकाश वर्ष की दूरी पर है। तो पहले तारे के पास मौजूद कोई दर्शक उस तारे को फौरन देख लेगा, दूसरे को एक लाख साल बाद देखेगा और तीसरे को दो लाख साल बाद देखेगा। यानि एक ही वक्त में पैदा हुए तीन तारे दर्शक के लिए अलग अलग समय में पैदा हुए हैं। दूसरे शब्दों में तारों की स्थिति का उनके देखने के समय के साथ गहरा नाता है। हालांकि उनके जन्म का एक ही समय है। किन्तु देखने वालों के लिए हर चीज अलग अलग वक्त में पैदा होती नजर आयी।

अब यहां एक सवाल उठता है। करोड़ों लाइट इयर दूर तारों के लिए तो कहा जा सकता है कि हो सकता है वे एक साथ पैदा हुए हों, लेकिन हमें अलग अलग वक्त में दिखाई दे रहे हों। लेकिन खुद हमारे आसपास जो चीजें अलग अलग समय में पैदा हो रही हैं? क्या उनके जन्म का वास्तविक समय एक हो सकता है? मिसाल के तौर पर बाप बेटे या दादा पोते की पैदाइश । अब यहां ये देखना होगा कि आब्जर्वर कौन है। आब्जर्वर यानि कि हम अपने समय के साथ हैं। और यही समय उन चीज़ों से भी अटैच है जो हमारे आसपास मौजूद हैं। इसीलिए हमें उस वक्त के सापेक्ष चीज़ें अलग अलग पैदा होती दिखाई दे रही हैं। लेकिन अगर हम ऐसे आब्जर्वर की कल्पना करें, जो हमारे वक्त पर निर्भर नहीं है, तो उसे वह सारी चीज़ें एक साथ पैदा होती दिखाई दे सकती हैं जिन्हें हम अलग अलग वक्त में पैदा होते देख रहे हैं।

उपरोक्त जुमला कुछ अटपटा लग रहा है। क्योंकि हम ऐसे आब्जर्वर की कल्पना नहीं कर पा रहे हैं। इसलिए इसे एक उदाहरण से समझना ज्यादा सही होगा।

मान लिया ज़मीन पर इक्कीसवीं सदी की शुरुआत में किसी बच्चे अतुल का जन्म होता है। सत्तर साल बाद वह बच्चा एक बूढ़ा साइंटिस्ट डा0 अतुल बन चुका है। इस बीच साइंस ने तरक्की की और एक ऐसी किरण बनाने में कामयाब हो गयी जो रौशनी से भी लाखों गुना ज्यादा तेज चलती है। यह किरण सत्तर प्रकाश वर्ष की दूरी एक सेकंड में तय कर लेती है। साइंटिस्ट डा0 अतुल इस किरण को अंतरिक्ष में भेजता है और उस रौशनी को कैच कर लेता है जो उसकी पैदाइश के वक्त उसके पास मौजूद थी। इस तरह वह खुद अपनी पैदाइश का आब्जर्वर हो जाता है। इस तरह तकनीक एक ही इंसान को अलग अलग समय का आब्जर्वर बना देती है। और अगर वह वक्त से अलग हटकर सोचे तो जमीन पर अलग अलग वक्त में हुई घटनाएं उसके लिए एक साथ होती हैं। तो अब यहाँ साफ हो जाता है कि वक्त सापेक्ष (Relative) है। जो चीज़ें हमें अपने वक्त के पैमाने पर अलग अलग दिखती हैं। कोई और अगर उन्हें अपने वक्त के पैमाने पर देखेगा तो उस आब्जर्वर के लिए उन चीजों के पैदा होने का वक्त कुछ और ही होगा।

आइंस्टीन की थ्योरी ऑफ रिलेटिविटी पूरी तरह रौशनी या इलेक्ट्रोमैग्नेटिक वेव्स पर निर्भर है। इसकी वजह ये है कि हम यूनिवर्स में जो कुछ भी देखते हैं वह रौशनी या दूसरी इलेक्ट्रोमैग्नेटिक तरंगों के जरिये देखते हैं। इन सभी तरंगों के कुछ समान गुण होते हैं। जैसे इनकी अंतरिक्ष में रफ्तार तीन लाख किलोमीटर फी सेकंड होती है। ये सभी ग्रेविटी फील्ड, मैग्नेटिक फील्ड और इलेक्ट्रिक फील्ड में अपने पथ से मुड़ जाती हैं। साथ ही किसी घने क्षेत्र (dense Area) में जाने पर भी ये अपने पथ को बदल देती हैं। जाहिर है कि ऐसी वेव्स के जरिये देखा जाने वाला यूनिवर्स वास्तविकता में कुछ और ही होगा। क्योंकि यूनिवर्स में दूरी (distance) भी है, ग्रेविटी, मैग्नेटिक व इलेक्ट्रिक फील्डस भी हैं। और ये सभी चीज़ें रौशनी और दूसरी वेव्स की विजिबिलिटी (देखने की ताकत) पर असर डालते हैं। आब्जर्विंग यूनिवर्स (दिखने वाली दुनिया या हब्बल वोल्यूम) से रियल यूनिवर्स (वास्तविक दुनिया) के बारे में पता करने के लिए आइंस्टीन और दूसरे वैज्ञानिकों ने कुछ गणितीय समीकरणों का सेट तैयार किया। लेकिन ये समीकरण इतने मुश्किल हैं कि इनका ठीक ठाक हल आज तक मुमकिन नहीं हो पाया है। इनमें सबसे आसान समीकरण आइंस्टीन की फील्ड इक्वेशंस के नाम से जानी जाती हैं। इनकों साइंसदानों ने काफी हद तक हल भी किया है। और इस हल से यूनिवर्स की असली तस्वीर बिल्कुल अलग ही नजर आती है। ये तो तब है जब दुनिया ने सिर्फ आसान समीकरणों को हल किया है। अगर सभी समीकरणों को हल किया जाये तो शायद हमारी दिखने वाली दुनिया पूरी तरंह मायावी (Virtual) हो जाती है।

अब एक साधन हो सकता है विजिबिलिटी बढ़ाने का। हमें कोई ऐसा मीडियम, कोई वेव मिल जाये जो प्रकाश या विद्युतचुम्बकीय तरंगों से भी कई गुना तेज हो। जिसपर ग्रैविटी जैसे फैक्टर्स असर न करें। फिलहाल ऐसा कोई मीडियम जो इलेक्ट्रोमैग्नेटिक वेव से बढ़कर हो हमारे सामने नहीं है। लेकिन भविष्य के बारे में कौन जानता है? कुछ हद तक इस भविष्य के बारे में अंदाजा जरूर मिलता है। जैसे कुछ ऐसे सपने जिनमें देखने वाले ने भविष्य की कुछ बातें देख लीं (अब्राहम लिंकन का अपनी हत्या के बारे में देखा गया सपना)। हो सकता है यूनिवर्स में कुछ ऐसी जगहें हों जो हमारे भविष्य को पहले से देख रही हों। और वहां से आने वाली रौशनी से भी तेज वेव्स कभी कभी हमारे दिमाग पर असरअंदाज हो जाती हों। फिलहाल ये विज्ञान की पहुंच से दूर है।

() () ()

9 comments:

रश्मि प्रभा... ने कहा…

सही तथ्यों को उजागर किया है

संगीता पुरी ने कहा…

सटीक वैज्ञानिक लेखन के लिए जीशान जैदी जी को धन्‍यवाद !!

पं.डी.के.शर्मा"वत्स" ने कहा…

साइंटिस्ट डा0 अतुल इस किरण को अंतरिक्ष में भेजता है और उस रौशनी को कैच कर लेता है जो उसकी पैदाइश के वक्त उसके पास मौजूद थी। इस तरह वह खुद अपनी पैदाइश का आब्जर्वर हो जाता है।

लेख बहुत उम्दा लगा..लेकिन उपरोक्त लाईनों में कहीं कुछ छूट गया लगता है...अपका कहना है कि डा.अतुल प्रकाशकिरण को अन्तरिक्ष में भेजता है..और साथ ही आप कह रहे हैं कि वो उस रौशनी को कैच कर लेता है जो उसके जन्म के समय उसके पास मौजूद थी.....अब यहाँ बात बिल्कुल सिर के ऊपर से निकले जा रही है...हो सके तो इस शंका का समाधान कीजिएगा.....
धन्यवाद्!

Arvind Mishra ने कहा…

पंडित शर्मा जी की बात का जवाब दीजिये -बहुत रोचक लिखा है आपने

zeashan zaidi ने कहा…

वत्स जी, कोई घटना हम तभी देखते हैं जब उसका प्रकाश हमारी आँखों तक पहुँचता है. प्रकाश निर्वात में तीन लाख प्रति सेकण्ड की रफ़्तार से चलता है. अब यदि कोई ऐसी किरण बन जाए जो प्रकाश से भी सैंकड़ों गुना तेज़ चलती हो तो उसके द्वारा हम अपने भूतकाल को उस समय का प्रकाश पकड़कर देख सकते हैं, क्योंकि उस समय का प्रकाश अपनी यात्रा करते हुए ब्रह्माण्ड में कहीं न कहीं अवश्य होगा.

अविनाश वाचस्पति ने कहा…

आज दिनांक 10 मई 2010 के दैनिक जनसत्‍ता में संपादकीय पेज 6 पर समांतर स्‍तंभ में भविष्‍य का यथार्थ शीर्षक से आपकी यह पोस्‍ट प्रकाशित हुई है, बधाई।

zeashan zaidi ने कहा…

Dhanywaad Awinash Ji

Yogesh ने कहा…

आपकी पोस्ट बेहद दिलचस्प लगी.
ये चीज़ तो स्पष्ट हो गयी कि हम अगर प्रकाश की गति से तेज चल पायें तो शायद हम अपना भूतकाल में घटी घटनाएं देख सकते हैं.

मगर भविष्य को देखना कैसे मुमकिन होगा?
मुझे ये बात अभी भी समझ नहीं आई है.
जो घटना घटी ही नहीं है अब तक, उसे कोई कैसे देख सकता है?

अगर उस सितारे वाला उदहारण को भी लिया जाए, जो सितारे के बिलकुल पास है और उसने देखा कि सितारा अभी पैदा हुआ है, जब कि दुसरे के अनुसार वो पैदा नहीं हुआ. इस तरह से वो भविष्यवाणी कर सकता है कि १ लाख साल के बाद एक सितारा पैदा होगा.

मगर कोई मेरे बारे में कैसे भविष्यवाणी करेगा? उपरोक्त उदहारण में तो observer, source के बिलकुल पास है. लेकिन अगर किसी को मेरा भविष्य बताना है, तो उसे मुझसे मेरे से भी ज्यादा नज़दीक होना पड़ेगा.

मुझे अभी भी लगता है कि भविष्य बताना संभव नहीं है, even theoretically also.

Yogesh ने कहा…

subscribing for e-mails.

Real Time Web Analytics