यह केवल उत्सव नही पारस्परिक प्रेम का प्रस्तुतिकरण है... आइए हिन्दी को नया आयाम दिलाएँ... हम सब मिलकर ब्लॉग उत्सव मनाएँ...

ऐसी होरी मचायो श्याम रे ....!

शुक्रवार, 18 मार्च 2011


हिन्दी साहित्य को अमर उपन्यास देने वाले फणीश्वर नाथ रेणू के बहुचर्चित आंचलिक उपन्यास "मैला आँचल " में फाग गीत अथवा ऋतुगीत के नाम से गाये जाने वाले लोक गीतों का बड़ा ही मार्मिक व् सटीक उपयोग हुआ है, जिसमें से एक है कान्हा के रंगीले मोहक मिजाज का मोहमय वर्णन , जो इस प्रकार है -

"अरे बहियाँ पकडि झकझोरे श्याम रे
फूटल रेसम जोड़ी चूडी
मसुकी गयी चोली भिंगावल साडी
आँचल उडि जाए हो
ऐसी होरी मचायो श्याम रे ....!"


मैला आँचल में एक पात्र है फुलिया जिसने रमजू की स्त्री के आँगन में खलासी जी से भेंट करके कहा था कि "इस साल होली नैहर में ही मनाने दो " मन की मस्ती भरी इस इच्छा को गीत के रूप में इस प्रकार उडेला गया है -



"नयना मिलानी करी ले रे सईयाँ
नयना मिलानी करी ले
अब की बेर हम नैहर रहिबो
जो दिल चाहे सो करी ले ......!"







आईये एक ऐसे कवि की चर्चा करते हैं जिन्होंने हिन्दी साहित्य को गीत विधा का नया रूप ही नही दिया अपितु गीत के माध्यम से हिन्दी साहित्य को नया आयाम भी दिया , नाम है गोपाल सिंह नेपाली जिन्होंने होली पर अपनी अभिव्यक्ति कुछ इस प्रकार दी है -


" बरस-बरस पर आती होली,
रंगों का त्यौहार अनूठा
चुनरी इधर, उधर पिचकारी,
गाल-भाल पर कुमकुम फूटा
लाल-लाल बन जाते काले ,
गोरी सूरत पीली-नीली ,
मेरा देश बड़ा गर्वीला,
रीति-रसम-ऋतु रंग-रगीली ,
नीले नभ पर बादल काले ,
हरियाली में सरसों पीली !"

sooryakant-tripathi-nirala-1





यह गीत उन्होंने वर्ष १९५७ में लिखी , जो आज भी प्रासंगिक है । कविवर सूर्यकांत त्रिपाठी निराला ने फागुन का वर्णन कुछ इस प्रकार किया है -


"सखि, बसंत आया ।
भरा हर्ष बन के मन ,नवोत्कर्ष छाया ।
किसलय-वसना नव-वय लतिका
मिली मधुर प्रिय -उर तरु पतिका ,
मधुप -वृन्द वंदी पिक-स्वर नभ सरसाया ।
सखि,बसंत आया । "



hari


वहीं डा० हरिवंश राय बच्चन की नज़रों में होली ऐसी है-


"एक बरस में एक बार ही
जगती होली की ज्वाला ,
एक बार ही लगती बाजी,
जलती दीपो की माला,
दुनिया वालों ,किंतु किसी दिन
आ मदिरालय में देखो ,
दिन को होली , रात दिवाली ,
रोज मनाती मधुशाला !"




gopaldas-neeraj


प्रखर गीतकार गोपाल दास नीरज की नज़रों में बसंत कुछ ऐसा है-




"आज वसंत की रात ,
गमन की बात न करना ।
धूल बिछाए फूल-खिलौना,
बगिया पहने चांदी-सोना,
कलियाँ फेंके जादू-टोना,
महक उठे सब पात,
हवन की बात न करना । "


और अब बसंत की बात छेड़ने पर क्या कहते हैं कुंवर वेचैन ?




बहुत दिनों के बाद खिड़कियाँ खोली हैं
ओ वासंती पवन हमारे घर आना!

जड़े हुए थे ताले सारे कमरों में
धूल भरे थे आले सारे कमरों में
उलझन और तनावों के रेशों वाले
पुरे हुए थे जले सारे कमरों में
बहुत दिनों के बाद साँकलें डोली हैं
ओ वासंती पवन हमारे घर आना!
और राम विलास शर्मा की नज़रों में देखिये वसंत के शब्द चित्र :


तेज हो जाती है रक्त की रफ़्तार 
और/ खिल उठते  हैं 
अनुराग रंजित सुर्ख फूल 
देखते-देखतेवसंत 
महज चितवन से 
एक ही झटके में उखाड़ देता है 
बाघिन सी खूंखार सर्दी के 
नुकीले, तीखे नख दन्त 
बड़ा बाजीगर है वसंत !
इस सन्दर्भ में राष्ट्रकवि दिनकर का अंदाज़ कुछ अलग हटाकर है :


लौट जाता गंधवह सौरभ बिना फिर-फिर मलय को,
पुष्पषर चिंतित खडा संसार के उर की विजय की ,
मौन खग विस्मित- " कंहा अटकी मधुर उल्लास वाली !
मैं शिशिर - शीर्णा चली , अब जाग ओ मधुमासवाली !!
 
मुक्त करने को विकल है लाज की मधु-प्रीति  कारा,
विश्व - यौवन की        शिरा में नाचने को रक्तधारा,
चाहती छाना दृग में आज तजकर गाल लाली !
मैं शिशिर - शीर्णा चली , अब जाग ओ मधुमासवाली !!
!!मस्ती !!

() () आनन्द विल्थरे

वसंत के 
विस्तरे पर लेटा फागुन 
मेरे भी दिल में 
आग भड़का रहा है 
काश, हम उसे 
समझा पाते
कि गीली बारूद के पीछे
मिहनत  करने से कोई
लाभ नहीं है,
लेकिन वह तो 
अपनी ही धुन में
भर-भर कटोरे
मस्ती छलका रहा है !
()()()
गजानन सिंह 'नम्र' बसंत का स्वागत करते हुए कुछ इसतरह बयान करते हैं :


आम्र के श्रृंगार में, नीर के आगार में,
तारों की बरात में, उजाला वसंत है !


उषा की ललाई में, रवि अरुणाई में ,
शशि अंगराई में, निखारा वसंत है !


जीवन संगीत में, मानव की प्रीत में 
भ्रमरों के गीत में, बिखरा वसंत है!


नवल आकाश में, कोमल सी घास में,
मन के विशवास में,  लहरा वसंत है !
और आनंद शर्मा कहते हैं कि :

पीली पडी धरा की देह 
फागुन इतने रंग न घोल!


जमीन बर्फ कुछ तो पिघला दे 
माथा ठंडा है, सहला दे,
होते दीवारों के कान-
फागुन हौले-हौले बोल!


पीली पडी धरा की देह 
फागुन इतने रंग न घोल!

बीत गया स्मृतियों का वर्ष !!

शनिवार, 1 जनवरी 2011








परिकल्पना समूह के हमारे सम्मानित पाठकों ,

लिए विशद विषाद हर्ष , बीत गया स्मृतियों का वर्ष !!

प्रगतिशीलता के नूतन आयामों से सुसज्जित यह नया वर्ष -२०११
आप सभी को -
भावनाप्रद, ऊर्जाप्रद और प्रेरणाप्रद
प्रकाश रथ का सारथी बनाए
हर प्रकार की खुशियाँ आपके प्रभामंडल में सिमट जाए
मिले आरोग्यता की शीतल छाया
और उपलब्धिया हर समय खडी रहे आपके द्वार
और पूर्ण सुरक्षा बोध के साथ -
आप सभी को मिले हर किसी का स्नेह , हर किसी का प्यार ......!



नव वर्ष मंगलमय हो !

शुभेच्छु-
रवीन्द्र प्रभात
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क्या सचमुच हमारी भावनात्मक एकता कमजोर हो रही है ?

बृहस्पतिवार, 23 दिसम्बर 2010

नि:संदेह भारत ने एक संप्रभुता संपन्न राष्ट्र के रूप में बड़ी-बड़ी उपलब्धियां प्राप्त की । आई टी सेक्टर में दुनिया में उसका डंका बजा । चिकित्सा,शिक्षा, वाहन, सड़क, रेल, कपड़ा, खेल, परमाणु शक्ति, अंतरिक्ष विज्ञान आदि क्षेत्रों में बड़े काम हुए । परमाणु शक्ति संपन्न राष्ट्र का रुतवा भी हासिल हुआ । तेजी से यह देश आर्थिक महाशक्ति बनने को अग्रसर है । मगर राष्ट्र समग्र रूप से विकसित हो रहा है इस दृष्टि से विश्लेषण करें तो बहुत कुछ छूता हुआ भी मिलता है, विकास में असंतुलन दिखाई देता है एवं उसे देश के आखिरी व्यक्ति तक पहुंचाने में सफलता नहीं मिली है । जिससे भावनात्मक एकता कमजोर हो रही है , जो किसी राष्ट्र को शक्ति संपन्न , समृद्धशाली,अक्षुण बनाए रखने के लिए जरूरी है । यह समस्या चिंता की लकीर बढाती है ।

हमारे देश में इस वक्त दो अति-महत्वपूर्ण किंतु ज्वलंत मुद्दे हैं - पहला नक्सलवाद का विकृत चेहरा और दूसरा मंहगाई का खुला तांडव । जहां तक ब्लॉग पर प्रमुखता के साथ मुद्दों को प्रस्तुत करने की बात है, इस वर्ष प्रमुखता के साथ छ: मुद्दे छाये रहे हिंदी ब्लॉगजगत में । पहला बिभूती नारायण राय के बक्तव्य पर उत्पन्न विवाद, दूसरा नक्सली आतंक,तीसरा मंहगाई,चौथा अयोध्या मामले पर कोर्ट का फैसला,पांचवां कॉमनवेल्थ गेम में भ्रष्टाचार और छठा बराक ओबामा की भारत यात्रा ।इन्हीं छ: मुद्दों के ईर्द-गिर्द घूमता रहा हिंदी ब्लॉगजगत पूरे वर्ष भर ।

कौन-कौन से मुद्दों पर हिंदी ब्लॉगजगत ने कैसी रणनीति बनायी, सार्वजनिक रूप से क्या कहा और भ्रष्टाचार आदि मुद्दों पर क्या प्रतिक्रिया रही हिंदी ब्लॉग जगत की, जानने के लिए चलिए चलते हैं परिकल्पना पर जहां आजकल वार्षिक हिंदी ब्लॉग विश्लेषण प्रकाशित किये जा रहे हैं -
वार्षिक हिंदी ब्लॉग विश्लेषण (भाग-१ )

वार्षिक हिंदी ब्लॉग विश्लेषण (भाग-२ )

वार्षिक हिंदी ब्लॉग विश्लेषण (भाग-३ )

वार्षिक हिंदी ब्लॉग विश्लेषण (भाग-४ )

वार्षिक हिंदी ब्लॉग विश्लेषण (भाग-५ )

वार्षिक हिंदी ब्लॉग विश्लेषण (भाग-६ )

वार्षिक हिंदी ब्लॉग विश्लेषण (भाग-७ )

परिकल्पना ब्लॉग विश्लेषण में आज

मंगलवार, 14 दिसम्बर 2010

जी हाँ ,
परिकथा के नवंबर-दिसंबर अंक में प्रवक्ता, अनवरत, हिंद युग्म की हिंदी खबर, चिट्ठा चर्चा, औब्जेक्सन मी लॉर्ड, जगदीश्वर चतुर्वेदी के साथ परिकल्पना के शब्द सभागार की चर्चा हुई है !
ये तो हुई परिकथा में परिकल्पना की बात ।
और अब आपको यह बता दूं कि आज परिकल्पना ब्लॉग विश्लेषण के अंतर्गत वर्ष-२०१० में हिंदी ब्लोगिंग में सक्रिय
५०० से ज्यादा साहित्यकारों की चर्चा हुई है ।
यदि आप साहित्य कर्म से जुड़े हैं और हिंदी ब्लोगिंग में इस वर्ष सक्रिय रहे हैं तो आप अवश्य शामिल होंगे इस विश्लेषण में .....
तो देर किस बात की आईये चलते हैं आज के विश्लेषण पर एक नज़र डालने ......लिंक के लिए यहाँ किलिक करें

आप भी शामिल हो सकते हैं परिकल्पना वार्षिक ब्लॉग विश्लेषण में

सोमवार, 13 दिसम्बर 2010




यदि आप सक्रिय ब्लोगर हैं और सार्थक ब्लोगिंग करते हुए सकारात्मक गतिविधियों में संलग्न हैं तो पूरे वर्ष भर के लेखा-जोखा में आप भी शामिल होईए, ढूंढिए विश्लेषण में अपना और अपने ब्लॉग का नाम , यदि दिखाई न दे तो कॉमेंट बॉक्स में डाल दें अपने ब्लॉग का नाम और पता , आपका ब्लॉग स्वयं बोलेगा अपने बारे में इस विश्लेषण के दौरान , तो देर किस बात की ये लीजिये लिंक जहां आपको पहुँचना है-
http://www.parikalpnaa.com/

वर्ष २०१० :ब्लोगिंग के तीव्र विस्तार से ब्लोगरों के बीच प्रतिस्पर्धात्मक चुनौती पैदा हुई

बृहस्पतिवार, 9 दिसम्बर 2010

हिंदी ब्लोगिंग वर्ष-२०१० में ७ वर्ष पूर्ण कर चुकी है । यह सुखद पहलू है कि विगत कई वर्षों की तुलना में वर्ष-२०१० में हिंदी ब्लोगिंग समृद्धि की ओर तेज़ी से अग्रसर हुई है । इस वर्ष लगभग ८ से 10 हजार के बीच नए ब्लोगर्स का आगमन हुआ है , किन्तु सक्रियता के मामले में इस वर्ष आये ब्लोगर्स में से केवल ५०० से १००० के बीच ही सक्रिय हैं और सार्थक लेखन के मामले में ३०० के आसपास ।

कुल मिलाकर यही कहा जा सकता है कि तपी जमीन को कुछ ठंडक देने का काम हुआ , लेकिन विकासक्रम की द्रष्टि से अन्य भाषाओं की तुलना में बहुत संतोषप्रद नहीं कहा जा सकता । हिंदी ब्लोगिंग की सात वर्षों की इस यात्रा में अमूमन यही देखा गया कि यह ब्लॉगरों के लिए एक ऐसा धोबीघाट रहा ,जहां बैठकर वे अपने घर से लेकर गली-मोहल्ले तक की तमाम मैली चादरों को धोने का काम करते रहे और सुखाते रहे ।

पूरा आलेख पढ़ने के लिए यहाँ किलिक करें .......

चिट्ठियाँ / आशीर्वचन / सन्देश .....ब्लोगोत्सव के लिए

बुधवार, 8 दिसम्बर 2010


प्रख्यात चित्रकार इमरोज ने कहा - किसी उपनिषद् की तरह है यह परिकल्पना !
अपने आप को गीत गाने दो
अपने आप को सुनने दो
हम काफी हैं
अपना आप गाने के लिए
और अपना आप सुनने के लिए

किसी उपनिषद की तरह है यह परिकल्पना
हर दिन सुनता हूँ इसके बारे में
हो सकता है
सागर की गहराई को किसी दिन नाप लिया जाये
पर इस परिकल्पना की गहराई
कभी नहीं नापी जा सकेगी ...
बस यूँ समझो
परिकल्पना के बीच
सबकी नज़र खूबसूरत हो गई है
एक दूजे को सभी नज़्म नज़र आ रहे हैं
दुआ है परिकल्पना
तुम नदी की तरह बहो
मैं सागर तक तेरा किनारा हूँ
शुभकामनाओं के साथ,
इमरोज़
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दुष्यंत के बाद हिंदी के बहुचर्चित गज़लकार श्री अदम गोंडवी परिकल्पना ब्लॉग उत्सव के नाम अपने सन्देश में कहा है कि-


" हिन्दी ब्लॉगिंग शैशवा-वस्था से आगे निकल कर किशोरावस्था को पहुँच रही है, ऐसे में जरूरत है हिंदी ब्लोगिंग के माध्यम से एक नयी क्रान्ति की प्रस्तावना की जाए । सफलता-असफलता के बारे में न सोचा जाए, केवल कर्त्तव्य किया जाए । सामूहिक कर्त्तव्य के बल पर ही हिंदी ब्लोगिंग का विकास संभव है ।

इंटरनेट की दुनिया में पहली बार हिंदी ब्लॉग पर उत्सव की परिकल्पना, सुनकर सुखद आश्चर्य हुआ । परिकल्पना ब्लॉग उत्सव का शुभारम्भ आपने किया है वह स्वागत योग्य है । आपका यह कदम आन्दोलन धर्मी, रंगकर्मी, साहित्यकार व उद्यीमान रचनाकारों के लिए एक उपयोगी कदम है। मैं परिकल्पना ब्लॉग उत्सव का स्वागत करता हूँ।"


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कविवर पन्त की बेटी ने कहा -परिकल्पना ने त्रिकाल दर्शन करा दिए ....

सुना है --- श्यामल आकाश की सौरभमई मिट्टी पर ही कल्पना के कुसुम खिलते हैं,

कोई अज्ञात प्रेरणा मन की बाहें थामकर चाँद सितारों के गाँव से आगे परीलोक में पहुंचती है . पर यह उत्सवी परिकल्पना ! समय की गतिशील धुरी पर इसने तो त्रिकाल दर्शन करवा दिए . अमिट एवं वन्दनीय चरण चिन्हों की अनुपम झलक दिखाई . 'परिकल्पना' के कल्पक श्री रवीन्द्र प्रभात जी एवं उनके सहयोगियों को जितना भी साधुवाद कहें - कम है . कवितायेँ, कहानियाँ, साक्षात्कार ,.... सब एकसाथ . महादेवी जी के शब्दों में मैं यही कहना चाहूँगी ---
" अनिल घूम देश-देश
लाया प्रिय का सन्देश
मोतियों के सुमन कोष
वार वार री
शुभकामनाओं के प्रोज्ज्वलित दीपों के साथ ,
सरस्वती प्रसाद (पन्त की बेटी)

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आर्ट ऑफ लिविंग के सुमन सिन्हा का कहना है कि - " संभावना हो तुम !"


"परिकल्पना उत्सव को मैं शुभकामना नहीं दूंगा ,
आशीर्वाद दूंगा ,
तुम्हारे पंख कभी आश्रित नहीं हों .
मैं जानता हूँ ,
तुम सब ऊँची से ऊँची मंजिल से भी ऊँचे जाओगे ,
क्यूंकि ,
तुम में , मैं एक सम्भावना देख रहा हूँ ,
तुम्हारे अन्दर स्वाभिमान देख रहा हूँ ,
खुद में विश्वास ,
निर्भीक मन ,
सब के वास्ते श्रद्धा देख रहा हूँ .
और चाहिए ही क्या ,
मंजिल से आगे निकल जाने के लिए ?
याद रखना जीवन को हमेशा सामने से जीना
छुप कर ओट से नहीं .
अगर कभी किसी प्रकार से मेरी जरूरत लगे
तो बस
एक कॉल की दूरी पर हूँ ,
काल और परिस्थिति मुझे कभी रोक नहीं पाई है ...
हमेशा तुम सब आगे बढ़ो..........
() सुमन सिन्हा, पटना (बिहार)
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चिट्ठी अर्श की -


"बहुत बहुत बधाई इस माहौल को बनाने और कायम रखने के लिए... ब्लॉग महोत्सव ... अहा क्या बात है ... बहुत सारी बातें देखने और सीखने को मिल रही हैं...''

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चिट्ठी ललित शर्मा की -


" यह उत्सव ब्लाग जगत के इतिहास में अवश्य ही मील का पत्थर साबित होगा , क्योंकि इसमें समर्पण,प्रतिबद्धता उत्साह,सृजन और रचनात्मकता का अनोखा मिश्रण है !"



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चिट्ठी रश्मि प्रभा की - "
"समय तुम्हारी क्या बात ... तुमने तो पूरे काल को हमारे आगे रख दिया.
तुम्हारे गर्भ से निःसृत हर साज हमें मुग्ध कर रहे हैं .......
मधुर आरम्भ है ये तो , समय तुम जिसके सहचर बने हो -
उसे बधाई यह उत्सव समय का सशक्त इतिहास बनेगा ।"
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प्रवीण पाण्डेय ने कहा- "अभिनन्दनीय प्रारम्भ" ...आकांक्षा ने कहा- "वाकई यह समय ब्लॉग-उत्सव में खोने का है...बधाइयाँ !!" अदा ने कहा- "इस प्रयास की जितनी तारीफ की जाए कम होगी ...." हिमांशु ने कहा- "अभिनव उत्सव का अभिनव श्रीगणेश ! रचनात्मकता का नया आयाम ......!

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आचार्य संजीव वर्मा "सलिल " ने कहा-
"परिकल्पना परिकल्पना की दे अमित आनंद.
मिलें शतदल कमल से हम, गुँजा स्नेहिल छंद..
रचें चिट्ठों का अभी मिल, नया ही संसार.
बात हो केवल सृजन की, सब तजें तकरार..
गोमती से नर्मदा मिल, रचे नव इतिहास.
हर अधर पर हास हो, हर ह्रदय में हो प्यास.. "
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नमस्कार !
परिकल्पना ब्लॉग उत्सव के लिए एक कदम आगे की पूरी टीम की और से बहुत बहुत बधाई।
हिंदी ब्लॉगिंग की गंभीरता और व्यापकता के लिए यह एक महत्वपूर्ण प्रयास है। साथ ही यह अपने समय से साक्षात्कार करने का भी मौका है। इस संबंध में सूचनाएं भेजते रहें। एकगे में हमने संपादकीय पेज पर ब्लॉग कोना कॉलम रखा है। इसमें आगामी अंक में ब्लॉग उत्सव पर विशेष सामग्री दी जाएगी। कृपया इस संदर्भ में सहयोग करें।
भरत कुमार,
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बात उन दिनों की है जब इस उत्सव की केवल परिकल्पना की गयी थी और-एक स्वर में लगभग सभी चिट्ठाकारो के साथ-साथ अविनाश वाचस्पति ने कहा- " नेक विचार" साथ ही इस उत्सव को एक पञ्च लाईन भी उन्होंने दिया -"अनेक ब्लॉग नेक हृदय " उन्होंने यह भी कहा कि " अब हम समस्‍त हिन्‍दी ब्‍लॉगरों के हृदयों को नेक बनाने की मुहिम चला रहे हैं। उसके बाद ब्‍लॉग पाठकों को और फिर समस्‍त संसार को। आप सब इस मुहिम में हमारे साथ हैं।"

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नीरज गोस्वामी ने अपनी भावनाएं व्यक्त करते हुए कहा था कि -"बहुत नया विचार है और अच्छा भी लेकिन ये बहुत मेहनत मांगता है......जिसमें यश मिलने की कम और अपयश मिलने की सम्भावना अधिक है...ये सब जानते बूझते हुए भी अगर आप ऐसा कदम उठाना चाहते हैं तो हम आपके साथ हैं...!"
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हिमांशु ने कहा - "गुरुतर कार्य है, पर शायद आप ऐसे गुरुतर कार्य की शुरुआत और उसे सम्पादित कर सकने वाले सर्वमान्य व्यक्तित्व हैं । यह सोच ही अत्यन्त महत्वपूर्ण है, और शुरुआत भी । हम सब साथ हैं आपके। रचनात्मक सोच यही तो है ।'' गौतम राजरिशी ने कहा- " ये तो बड़ा ही श्रम-साध्य वाली परिकल्पना है रविन्द्र जी। लेकिन आपकी क्षमता से पूरा हिंदी-ब्लौग परिचित है... !"

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निर्मला कपिला ने कहा -"प्रभात जी आपकी प्रतिभा और कुछ नया करने की क्षमता तो हम परिकल्पना पर पहले भी देख चुके हैं । और अब ये नया प्रयास "परिकल्पना ब्लॉग उत्सव-2010" तो और भी सराहणीय कदम है। बेशक ये एक दुरूह कार्य है मगर मुझे पूरा विश्वास है कि आप इसे कर पायेंगे। आपकी कर्मठता और साहित्य सेवा वंदणीय है। बहुत बहुत शुभकामनायें। ''

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अजय कुमार झा ने कहा -"रवीन्द्र जी मुझे तब बहुत मजा आता है जब पाता हूं कि कोई एकदम नई सोच और परिकल्पना के साथ सामने आता है ...और आपके लिए तो कहा ही क्या सच कहा आपने ...आज ब्लोगजगत को उत्सव परंपरा को निभाने की बहुत जरूरत है ...! "

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जी. के. अवधिया ने कहा - "आपके द्वारा पूर्व में किये गये कार्य सराहनीय रहे हैं और आपका यह कार्य तो सोने में सुगंध का काम करेगा। "



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डा. अरविन्द मिश्र ने कहा- "ब्लॉग-जगत में अनगिन उत्तरदायित्वहीनताओं और निष्क्रियताओं के मध्य ऐसा मौलिक उत्तरदायी प्रयास सराहनीय है ! मैं इस पहल से एक नयी आशा का स्वर सुन पा रहा हूँ.....प्रशंसनीय उपक्रम उत्सव का यह रंग हमारी परंपराओं और रीति-रिवाजों को कायम रखने, आपस में लोगों को जोड़ने और सर्वत्र हंसी-खुशी का वातावरण बनाए रखने में मदद करता है ।आपने तो एक इतिहास ही रच दिया है रविन्द्र जी ,आज जब सभी आत्म प्रचार में जुटे हैं आपने एक साझे अभियान को गति देकर यह साबित कर दिया है की आज भी सामाजिक सरोकारों के लिए कुछ कर गुजरने के जज्बे लोगों में हैं -आपके इस जज्बे को सलाम ! "
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रश्मि रबीजा ने कहा- "यह बहुत ही स्वागत योग्य कदम है...प्रसन्नता है कि कुछ चुनिन्दा उत्कृष्ट रचनाएं पढने को मिलेंगी। "




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बसंत आर्य ने कहा है कि " आप या तो कोई जिन्न हैं या आपके पास कोई जिन्न है ...कोई भी व्यक्ति इतना काम करे यकीं नहीं होता ....!" खैर असंभव को संभव करने का दूसरा नाम है परिकल्पना ब्लॉग उत्सव-2010
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संगीता पुरी ने कहा है कि
आपके विचारों की 'परिकल्‍पना' के द्वारा की गयी ब्‍लोगोत्‍सव 2010 की परिकल्‍पना सुदर यथार्थ में बदलती जा रही है .. पहले दिन से ही मैं इसका आनंद लेती जा रही हूं .. आज के सफलतापूर्ण संपन्‍नता पर आपको ढेरो बधाई .. आगे भी इंटरनेट के हिंदी पाठकों के लिए यह कुशलतापूर्वक ज्ञान , कला और साहित्‍य का भंडार लेकर उपस्थित होती रहेगी .. इसके लिए शुभकामनाएं !!

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" ब्लॉग जगत के आँगन में न्यारा सा उत्सव आया
बड़े बड़े कलाकारों ने फिर
श्रम से उसे सजाया .
हर विधा हर कला का इसमें .
रंग -रूप है महका .
हो कूंची जैसे विन्ची की
परिकल्पना है दमका .
आरम्भ से आगत तक
एक -एक सुर रसीला
माँ सरस्वती की वीणा का
हर तार ज्यूँ है खनका .
मेरा सौभाग्य बनी पथिक मैं
इस उत्सव में स्थान मिला
.इतने विद्वानों में मुझको भी
थोडा कुछ सम्मान मिला
कोटिश आभार उस टोली को
जिसने स्वप्न ये साकार किया
अपने श्रम से ब्लॉग जगत को
ये स्वर्णिम उपहार दिया"

() शिखा वार्ष्णेय ,लन्दन
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दो पुरस्कृत चिट्ठियाँ :

आदरणीय रवीन्द्र जी,
नमस्कार,
परिकल्पना ब्लॉग-उत्सव की परिकल्पना स्वयं में एक अभिनव-प्रयास है ! ब्लॉग-जगत में अनगिन उत्तरदायित्वहीनताओं और निष्क्रियताओं के मध्य ऐसा मौलिक उत्तरदायी प्रयास सराहनीय है ! मैं इस पहल से एक नयी आशा का स्वर सुन पा रहा हूँ ! अनोखा कदम है यह जिसके माध्यम से हम क्रमशः अभिव्यक्त ही नहीं हो रहे, अपितु एकात्म की ओर अग्रसर हो रहे हैं...एक का हृदय दूसरे के समीपतर होते जाना संभव हुआ इस उत्सव की परिकल्पना से ! आपको बधाई व इसकी सफलता के लिए शुभकामनाएं !
आपका -
हिमांशु कुमार पाण्डेय
=========================================================
आदरणीय प्रभात जी,
ब्लोगोत्सव २०१० की परिकल्पना के बारे में पढ़ा तो लगा कि चलो एक मंच मिलेगा बहुत कुछ एक साथ पढ़ने का...एक जिज्ञासा हुई कि सबके ब्लोग्स की सबसे अच्छी पोस्ट पढ़ पाएंगे...बहुत कुछ नहीं सोचा था...लेकिन जब इस उत्सव का आगाज़ हुआ...अशोक चक्रधर जैसे साहित्यकार से ,इमरोज़ साहब की पेंटिंग से....लगा ये तो कुछ विशेष है...और सच मानिये ये उत्सव सच में ही एक विशेष उत्सव बन कर आया...

गणपति वंदना से इसका आरम्भ हुआ जिसे स्वर दिया स्वप्न मंजूषा जी ने...और शब्द बद्ध किया था सलिल जी ने....आरम्भ ही इतना कर्णप्रिय रहा..और शुरू में लिखा हुआ कि मैं समय हूँ.....सच ही समय की महत्ता को बता गया...

सबसे बड़ी विशेषता रही कि हर विधा को इसमें स्थान मिला...विषय वस्तु सब चुनी हुई...लेख, कहानी , कविताएँ, ग़ज़ल, संस्मरण. साक्षात्कार और विशेष विषय पर लेख और बच्चो की रचनाएँ सब ही तो था यहाँ पढने और जानने के लिए.....एक से एक बढ़ कर सारगर्भित विषय...

इमरोज़ की रचनाओं ने और उन पर लिखी रचनाओं ने मन मोह लिया...

इस उत्सव को इस रूप में प्रस्तुत करना कोई सरल कार्य नहीं था....इसके लिए रविन्द्र प्रभात जी को साधुवाद देना चाहूंगी...और उनकी पूरी टीम को आभार...इतनी मेहनत और लगन से इस ब्लोगोत्सव को हम सबके बीच उपस्थित किया.....इस यात्रा की एक पथिक मैं भी रही इसी की बहुत संतुष्टि है.....रश्मि जी का प्रयास नि:संदेह प्रशंसनीय है...उनकी कर्मठता इस उत्सव में साफ़ झलकती है..

ब्लॉग जगत में ये उत्सव सच ही मील का पत्थर साबित होगा....
शुभकामनायें
संगीता स्वरुप ..




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!! उत्सवी स्वर !!
प्रकृति के सुकुमार कवि की परिकल्पनाओं की धरती पर
हुआ है नीड़ का निर्माण फिर
बच्चन की मधुशाला के शाश्वत अर्थ को
मिला है एक सम्पूर्ण आधार
खोल आकाशीय द्वार
महादेवी की तरह कहा है सबसे
'जो तुम आ जाते एक बार '
लोगों की हर आहट पर
बावरा मन देखता है एक सपना
पृष्ठ दर पृष्ठ
अमिट यादों का सैलाब
इससे अपूर्व समुद्र मंथन और क्या होगा !
कलयुग के चक्र को भी
शब्दों, विचारों , भावनाओं ने घुमा दिया है
सतयुग, द्वापर युग, त्रेता युग
ठगे से इसका कर रहे हैं अवलोकन
इन्द्रधनुषी छटा बिखरी है सर्वत्र...
रचनाकार , गीतकार, संचालक , अतिथि
सब है एकाकार !
नीलम प्रभा के लिखे गीत के ये बोल जीवंत हो उठे हैं
'सब ऋषि मुनि आशीष दे रहे
हनुमंता चंवर डोलावत हैं'
सुप्त अवस्था में पड़ी सरस्वती की वीणा
झंकृत हो उठी है
आडम्बरों से दूर इस अलौकिक उद्यान में
देवता भी आशीर्वचन लिख रहे हैं
इस आयोजन के हर संचालक को
मुक्त विस्तार दे रहे हैं...
अपनी भाषा, अपने देश की हर गरिमा
हर परिवेश को हमने पढ़ा और जाना है
' विश्व बंधुत्व' का शंखनाद किया है
हमारी कल्पना ,परिकल्पना का
है यह अविस्मरनीय उत्सव
चलो मिलकर एरथ
नए स्वर नए विश्वास का आगाज़ लिए ..........
'मिले सुर मेरा तुम्हारा
तो सुर बने हमारा '
() रश्मि प्रभा
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